प्रकरण - कोरोना से अब तो डरो न


शीर्षक :- कोरोना से अब तो डरो न

पता नहीं ये प्रकोप कैसा है,
           पता नही ये रोग कैसा है।
बंद पड़ा है देश पूरा,
           न जाने ये शोक कैसा है।


जिधर चुनाव है उधर सब शांति है,
           पूरा रोग सिर्फ प्रगति के आड़े आ बैठा है।
                 न जाने ये रोग कैसा है ??....

दवांए बहुत है, उपाय बहुत है।
    काम कुछ नहीं आ रहा ये संयोग कैसा है।

जहां इकट्ठा होते हैं लाखो वहां नहीं फैलता,
           बेंच पर बैठे दो बच्चों में फैल जाता।
                 न जाने ये रोग कैसा है ??....

सारी गलती इसकी ही नहीं, 
           लापरवाह इंसान भी हो बैठा है।
एक मरने पर मीडिया भी रोता था,
           लाखो मर गए मीडिया भी मदहोश बैठा है।
पता नहीं ये प्रकोप कैसा है,
             न जाने ये रोग कैसा है ??....

राजनीति से साठ - गाठ,
            ये आम लोक पर भारी है।
चुनाव खत्म होने तो दीजिए, 
           फिर लॉकडाउन की तैयारी है।

श्मशान धुआं फेक रहे, दिल्ली दिल से हारी है।
  उद्धव ताला लगाते फिरते, यूपी की अब बारी है।

परीक्षाएं रोक कर प्रधानी लड़ी जा रही है।
विद्यालय बंद करके महामारी रोकी जा रही है।

लखनऊ की हृदय विदारक सुर्खी, सब खबरों पर भारी है।
सूरत में है लकड़ी घटती, सेवा की दुश्वारी है।

24 घंटे कर्मी खटते, पल पल क्षण क्षण लोग है घटते
देश बना श्मशान है, वसंत ऋतू में पतझड़ आया विकल व्यथित परिस्थिति का आगाज है। 



कवि :- शाश्वत पाण्डेय





Comments

Popular posts from this blog

प्रकरण - श्रद्धांजलि