प्रकरण - कोरोना से अब तो डरो न
शीर्षक :- कोरोना से अब तो डरो न पता नहीं ये प्रकोप कैसा है, पता नही ये रोग कैसा है। बंद पड़ा है देश पूरा, न जाने ये शोक कैसा है। जिधर चुनाव है उधर सब शांति है, पूरा रोग सिर्फ प्रगति के आड़े आ बैठा है। न जाने ये रोग कैसा है ??.... दवांए बहुत है, उपाय बहुत है। काम कुछ नहीं आ रहा ये संयोग कैसा है। जहां इकट्ठा होते हैं लाखो वहां नहीं फैलता, बेंच पर बैठे दो बच्चों में फैल जाता। न जाने ये रोग कैसा है ??.... सारी गलती इसकी ही नहीं, लापरवाह इंसान भी हो बैठा है। एक मरने पर मीडिया भी रोता था, लाखो मर गए मीडिया भी मदहोश बैठा है। पता नहीं ये प्रकोप कैसा है, ...